एक दूधवाली की मदद से बनी थी विश्व की पहली वेकक्सिन (टीका)

दूध बेचनेवली और एडवर्ड जेनर: –

कई साल पहले एक महिला थी जो दूध बेचा करती थी, उसका चेहरा बहोत ही सुंदर था और वह अपने चेहरे पर प्रतिदिन एक विशेष प्रकार की क्रीम लगाया करती थी और उसकी हंसी भी बहुत आत्मविश्वास से भरी हुई थी और वह सभी लोगों से एक बात बहुत आत्मविश्वास से कहा करती थी ” मुझे एक बार cowpox नामक बीमारी हो गई है, इसलिए मुझे चेचक होने की कोई संभावना ही नहीं है और चेचक के कारण होने वाले निशान कभी भी मेरा खूबसूरत चेहरा नहीं बिगाड़ पाएंगे एक 13 साल का लड़का जो दूध वाली के पास खड़ा था , वह इस लड़की की सारी बाते सुन रहा था यह 13 साल का लड़का कोई और नहीं बल्कि हमारा एडवर्ड जेनर था, जिसने चेचक के टीके की खोज करके दुनिया को एक अनमोल उपहार दिया था वहा के लोगो के मनमे यह विचार भी नहीं था कि यह लड़का बड़ा होकर दुनिया के पहले टीके का संशोधन करेगा जो चेचक नामक जानलेवा बीमारी इलाज बनेगा एडवेर्ड जेनर के वैक्सीनके संशोधन की कहानी और उनके बचपन की कहानी आज तक सभी लोगोकों सुनाई जाती है जिनसे मेडिकल विभाग के छात्र आजभी प्रेरणा लेते है

एडवर्ड जेनर द्वारा टीके का पहला परीक्षण: –

धीरे-धीरे एडवर्ड जेनर बड़े होने लगते हैं और वह इंग्लैंड के बर्कले शहर में विशेषज्ञ डॉक्टर बन चुके थे । एडवर्ड जेनर ने 1796 में पहली बार जेम्स फिप नमक एक छोटे से बच्चे ऊपर सबसे पहले चेचक के टीके का परीक्षण किया था एक चेचक रोग के मरीज के अंदर से उसका खून निकाल कर एडवेर्ड जेनर ने उस खून को जेम्स के शरीर में दाखिल किया । यह प्रयोग केवल उनके द्वारा किएगये प्रशिक्षण का हिस्सा था जिसका उन्होंने अध्ययन किया था और जेनर के पास इस बात के कई उदाहरण थे जिससे यह साबित किया जा सकता था कि जो लोग पहले cowpox के शिकार हो चूके थे वे चेचक से पीड़ित नहीं थे जेनर को यह बात 13 साल की उम्र मे दूध बेचने वाली स्त्री के पास से पता चली थी लेकिन cowpox दोनों बीमारियों से एक आम बीमारी थी और जब चेचक एक घातक बीमारी थी उसके बाद जेनर ने जेम्स फिप्प नामक बच्चे में चेचक का इंजेक्शन लगाया लेकिन जेम्स को चेचक का कोई भी असर नहीं हुआ था समय के साथ साथ एडवर्ड जेनर अपने 11 वर्षीय बेटे सहित कई छोटे बच्चों पर एक सफल परीक्षण कर चुके थे।

जेनर के इस संशोधन को इतिहास के पन्नों पर लिखा जा चुका था ,यह प्रयोग एक जानलेवा ओर अत्यंत संक्रामक बीमारी चेचक को उसके टीके से मिटाने का एक सफल प्रयास था इस टीके के आविष्कार के बाद केवल दो शताब्दियों बाद 8 मई, 1980 को who नामक संस्था ने दुनिया को चेचक से मुक्त घोषित कर दिया था

चेचक के टीके के पीछे का वैज्ञानिक सिद्धांत: –

एडवर्ड जेनर ने वैक्सीन की खोज के पीछे एक सिद्धांत लगाया था कि जिन लोगों को पहले cowpox हुआ था उसके रोगाणु और चेचक के रोगाणु एक समान थे लेकिन इन दोनों बीमारियों के बीच जमीन आसमान का अंतर था, क्योंकि cowpox बीमारिके अंदर इंसान के शरीर के ऊपर सिर्फ आम धब्बे ही दिखाई देते थे जबकि चेचक के कारण लाखों लोग मारे जा चुके थे जब एडवेर्ड जेनर कोई भि इंसान के शरीरमे cowpox के रोगाणु दाखिल करते थे तब उस इंसान की रोग प्रतिकारक शक्ति इस रोगाणु से परिचीत हो जाती थी अगर भविष्य मे कभी भी उस आदमी को चेचक होता था तो उसकी रोग प्रतिकारक शक्ति चेचक के रोगाणुओ को मारने के लिए ताकतवर बन चुकी होती थी इसीलिए उन्हे कभी भी चेचक की कोई असर नही होती थी आपकी जानकारी के लिए आपको बतादे की दुनिया के सभी टीके एक ही तरह से काम करते हैं। किसी भी रोग का टीका बनाने के उसके ही रोगाणु का उपयोग किया जाता है, रोगके किटाणुओ को मानव के भीतर टीकाकरण के माध्यम से दाखिल किया जाता है और भविष्य में जब भी वह रोग मनुष्य को होता है, तब आदमी की रोग प्रतिकारक प्रणाली उसे उस बीमारी से बचाती है।

चेचक से मरने वाले लोग: –

चेचक एक ही वायरस की दो प्रजातियों से प्रसारित होता है जिसे ” वेरिओला मेजर ” और ” वेरिओला माइनर ” कहा जाता है। चेचक का आखरी केस 1977 में दर्ज किया गया था और इस बीमारी में मृत्यु दर लगभग 30% और छोटे बच्चों में यह दर और भी अधिक था और जो लोग जीवित बच जाते थे वह लोगों का शरीर डरावना लगता था या फिर वह लोग जिंदगीभर के लिए अंधे हो जाते थे रोग के प्रारंभिक लक्षण बुखार और वोमीटिंग थे, और फिर पूरे शरीर में बिचमे गड्डे वाले उभार निकलते थे लेकिन यह बीमारी चेचक कब और कहाँ उत्पन्न हुई, इस बारे में अभी तक कोई भी तथ्य सामने नहीं आया है हर साल लगभग 4 लाख लोग इस बीमारी की वजह से मर जाते थे और इन सभी मामलों से हर एक तिहाई लोग जीवन भर के लिए अंधे हो जाते हैं। 20 वीं शताब्दी में अनुमानित 3 करोड लोगों की मोत इस बीमारी के कारण से हुई थी और चेचक के फेलने से आज तक इसने 5 करोड़ लोगों की जान ले ली थी टीके का आविष्कार होने तक हर साल चेचक के 15 लाख मामले दर्ज होते थे

भारत में चेचक की पूजा और उसका धार्मिक महत्व: –

भारत में इस बीमारी से कई धार्मिक मान्यताएँ जुड़ी हुई थीं क्योंकि भारत के धार्मिक लोग चेचक की पूजा करने लगे थे और उस समय भारत के विभिन्न परदेशो मे इस रोग को विभिन्न नामसे जाना जाता था और खास कर के गुजरात में चेचक कई अलग-अलग नामों से जाना जाता था। भारत में और विशेष रूप मे गूज़रात में लोग इस बीमारी को रोकने के इस बीमारिकों लोग माता के रुपमे पूजते थे इसलिए हर सालके श्रवण माह के छठवें दिन को चेचक माता के दिवस के रूप में मनाया जाता है और उस दिन लोग माँ की पूजा करते हैं और कई नियमों का पालन भी करते हैं,

जैसे उस दिनको खाने के लिए कुछ भी बनाया नही जाता था और अगले दिन जो बनाया हुआ होता है वही खाना खाया जाता है गुजरात की महिलाए गेहु के आटे , गुड और घी से तैयार की गयी हुई मिठाई ” कुलेर ” बनाती थी यह कुलर सबसे पहले माता केमन्दिर मे चड़ाई जाती थी फिर इस मिठाइ को प्रसाद के रुपमे लोगो को बाटी जाती थी और इस दिन चेचक माता को मान ने वाला हर किसान अपने बैलों को गाड़ियों से नहीं जोड़ता है, और अजीब बात तो यह है की है, 1980 के दशक में चेचक के विलुप्त होने के इतने वर्षों के बाद भी गुजरात के हर गाव मे आपको चेचक माता का मंदिर मिल जाता है और आजभी वहा के लोग उसी भाव भक्ति से माता की पुजा किया करते है