एमडीएच के बूढ़े आदमी कैसे बने टांगे वाले से एक करोड़पति मसाला व्यापारी

एमडीएच के बूढ़े आदमी कैसे बने टांगे वाले से एक करोड़पति मसाला व्यापारी। एमडीएच मसाला के सार्वजनिक समाचार में आने से पहले उनके मालिक टांगे वाले से लेकर करोड़पति व्यवसायी बनने के संघर्ष की कहानी।

हम सभी इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं कि स्वतंत्रता के समय भारत को अंग्रेजों द्वारा विभाजित किए जाने पर सीमा पर लोगों को बहुत कुछ सहना पड़ा था। कुछ लोगों को पाकिस्तान में अपनी जमींदारी भी छोड़नी पड़ी और अपनी संपत्ति वहीं छोड़कर भारत आना पड़ा। और कितने ही परिवारों ने अपने प्रियजनों को खो दिया है ?

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फिर भी कई लोग इस संघर्ष से बाहर निकले और अपनी मेहनत से फिर शुरुआत की और सफलता के शीर्ष पर चढ़ गए। ऐसे लोगों में एमडीएच मसाला के मालिक भी शामिल हैं। हम सभी यह अच्छी तरह से जानते हैं कि एमडीएच मसाले के विज्ञापन में जो बूढ़े आदमी दिखते है, वह इसके मालिक भी है। लेकिन अगर शायद आप उनका नाम नहीं जानते हैं, तो आपको बता दें कि उनका नाम महाशय धर्मपाल गुलाटी है। लेकिन अगर आप उनके संघर्ष के बारे में नहीं जानते हैं, तो आइए हम आपको विस्तार से बताते हैं।

उनकी कहानी पाकिस्तान के सियालकोट विस्तार से शुरू होती है। उनका जन्म 27 मार्च, 1923 को पाकिस्तान के सियालकोट में हुआ था। उनका परिवार एक सामान्य परिवार था। मूल रूप से, वह एक मसाला व्यापारी थे। उनके पिता का पाकिस्तान में एक छोटा सा मसालों का व्यवसाय था। दुकान का नाम था महाशय दी हट्टी जिस पर से MDH नाम रखा गया है। एम- महाशय, डी- दी, एच-हट्टी।

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1933 में उन्होंने पांचवीं कक्षा में फेल होने के बाद स्कूल छोड़ दिया। और वह तुरंत अपने पिता द्वारा काम पर रख लिए गए, हालांकि वह अपने पिता के साथ दुकान में नहीं बैठना चाहथे थे इसलिए उनके पिता ने उन्हें बढ़ई काम सिखाने के लिए एक बढ़ई के पास भेज दिया। वहां मन न लगने पर उन्होंने वहां काम करना छोड़ दिया।

फिर उन्होंने कई व्यवसायों में अपना हाथ आजमाया, साबुन बेचना, कपड़े बेचना, अनाज बेचना, लेकिन कहीं भी टिक नहीं पायें। तब उन्होंने अपने विरासत वाले मसालों के व्यवसाय को अपना ने का फैसला किया। अभी तो कुछ हद तक वे इसमें सेट हो रहे थे उसी वक्त 1947 में देशका बंटवारा हुआ और सब कुछ बिखर गया।

वे तुरंत पाकिस्तान से दिल्ली रहने के लिए आ गए। लेकिन देश अभी तो सिर्फ आज़ाद हुआ था और देश की अर्थव्यवस्था अभी भी संघर्ष कर रही थी। उन्हें अपने पिता की तरफ से व्यवसाय शुरू करने के लिए 1,500 रुपये मिले, जिसमें से उन्होंने 650 रुपये से टांगा (घोडा गाड़ी) तैयार कीया और रेल्व स्टेशन पर घोड़े से चलने वाली गाड़ी के फेरे शुरू कर दिए।

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उसमें उनका मन नहीं लगा और व्यवसाय के लिए कुछ धन एकत्र होते ही उन्होंने अपने भाई को टांगा दे दिया। और दिल्ली में ही अजमल खान सड़क पर एक छोटी सी हाट लगाकर मसाले बेचना शुरू किया। धीरे-धीरे उनके मसाले बिकने लगे और उन्हें व्यवसाय में सफलता भी मिलने लगी। कुछ साल बाद, उन्होंने दिल्ली के चांदनी चौक में एक और दुकान शुरू की।

अब जब उनका व्यवसाय बढ़ रहा था, तो वे खुद ही उत्पादन भी हाथ पर लेना चाहते थे। इस हेतु से उन्होंने 1959 में दिल्ली के कीर्ति नगर में मसाले का कारखाना स्थापित किया। और अपने उत्पादन का नाम एमडीएच मसाला रखा गया। आज देश भर में एमडीएच के 15 कारखाने हैं।

भारतीय मसाले बाजार में इसकी 12% हिस्सेदारी है, और यह देश की दूसरी सबसे बड़ी मसाला कंपनी है। आपको बता दें कि एमडीएच मसाले न केवल भारत के लोगों द्वारा खाया जाता है बल्कि दुनिया के 100 से अधिक देशों में निर्यात किया जाता है। साथ ही इसके 60 से अधिक उत्पाद हैं।

आपको बता दें कि आज इस चाचा की हर साल की सैलरी 21 करोड़ रूपये से भी ज्यादा है। आज उनके पास 1500 करोड़ रुपये का विशाल साम्राज्य है। कंपनी हर साल लगभग 800-900 करोड़ रुपये कमाती है। साथ ही, उनका वार्षिक लाभ 200 करोड़ रुपये से अधिक है। आपको बता दें कि धर्मपाल गुलाटी की MDH मसाले में 80% हिस्सेदारी है।

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धर्मपाल गुलाटी भी अपनी करोड़ों की कमाई का अच्छा इस्तेमाल करना जानते हैं। उन्होंने जरूरतमंदों के लिए अपने भरोसे के तहत कई स्कूलों के साथ-साथ अस्पतालों का भी निर्माण किया है। इनमें एमडीएच इंटरनेशनल स्कूल, महाशय चुन्नीलाल सरस्वती शिशु मंदिर, माता लीलावती कन्या विद्यालय, महाशय धर्मपाल विद्या मंदिर आदि शामिल हैं।

क्या आपको पता है की 2017 में उन्होंने 94 साल की उम्र में सबसे ज्यादा कमाई करने वाले एफएमसीजी सीईओ होने का रिकॉर्ड भी अपने नाम किया है।